राजगढ़। भारतीय आजाद परिषद के सांस्कृतिक एवं साहित्य प्रभाग के प्रदेशाध्यक्ष एवं राष्ट्रीय ओज कवि यशवंत चौहान की  काव्य कृति मुक्ताहार का विमोचन मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंहजी चौहान के कर कमलों के द्वारा सम्पन्न हुआ। 2 अक्टूबर को मुख्यमंत्री निवास पर संपन्न पुस्तक विमोचन, भारतीय आजाद परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष जावेद खान एवं प्रदेश महासचिव अजय बक्शी की गरिमामय उपस्थिति में हुआ। प्रकाशन के पूर्व इस कृति की भूमिका एवं इसकी पृष्ठभूमि स्वयं लेखक के द्वारा प्रस्तुत की गयी। राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत ओज कवि यशवंत चौहान की काव्य कृति मुक्ताहार का प्रकाशन 2020 के आगाज़ के साथ ही हुआ। देश भारती प्रकाशन नयी दिल्ली के द्वारा प्रकाशित काव्य कृति मुक्ताहार वर्तमान परिदृश्य में प्रासंगिक है। यह कृति सच पूछा जाये तो राष्ट्रीय एकता पर लिखा गया खंड काव्य है। इस कृति में सातखण्ड मानों आकाश में सुशोभित सात इन्द्रधनुषी रंग है।  इसके विविध सप्त खंड इस प्रकार है - सृजन, प्रकृति ,एकता, संस्कृति, मानवता, रुमानियत व देश प्रेम। कृति का केंद्रीय भाव राष्ट्रीय एकता एवं भारत देश के प्रति अनुराग ही है।

प्रथम खंड सृजन में कवि ने श्री गणेशजी, ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माँ सरस्वती को अपना सृजन समर्पित किया है व सभी धर्मों के प्रति आदर भाव का प्राकट्य किया है । यथा - आव्हान है सारी धरा का / साहित्य गागर भर रहा हूँ / अर्ज सुनलो मेरी भगवन / मंगलाचरण मैं कर रहा हूँ / प्रकृति खंड के अंतर्गत कवि ने पर्यावरण प्रदूषण पर चिंता व्यक्त करते हुए सम्पूर्ण विश्व को सचेत किया है । यथा - काव्य की शोभा बढ़ाते / रस छंद और अलंकार / किन्तु प्रकृति ही है सदा / कविता का मूल आधार। एकता खंड के अंतर्गत सभी धर्मों के प्रति आदर का भाव परिलक्षित होता है - कुछ कह गये, कुछ सह गये / फिर गले मिले यह सिलसिला / सदियों से भारत एक ही है / यही है भारत का हौसला / कृति में भारतीय संस्कृति का अनुपम चित्रांकन कवि के द्वारा किया गया है - पूरब, पश्चिम,उत्तर दक्षिण / जपते हैं ईश्वर के नाम /संस्कृति के संवाहक हैं / देश में पुण्य चारो धाम । मानवता के दिव्य दर्शन है काव्य कृति में । जाती-पाती की भावनाएं, धर्म, व भाषा के नाम पर पृथकतावाद से कवि की आत्मा उसे कचोटती हैं । किसान, श्रमिक, गरीब व नारी आदि के प्रति उपेक्षा आदि को गहराई से अनुभव किया हैं - मानवता है क्यो शर्मसार / क्यों नारी का अपमान है / स्तब्ध है सारा वतन और / आज भ्रमित क्यो इंसान हैं।

रुमानियत में कवि की भावनात्मकता भी परिलक्षित होती हैं। इस खंड में नायिका के प्रति उदात्त प्रेम की अभिव्यंजना परिलक्षित है। जैसे कि निम्न मुक्तक में है - अनवरत व्याकुल है मन / बस तेरे ही दीदार का / तू यश है मेरा सदा ही / तू मोती मुक्ताहार का / किंतु फिर कवि अपनी मूल धारा की ओर लौट आता है ।बस राष्ट्र प्रेम और पुस्तक में अपने आत्म कथ्य के अनुरूप ओज के मूल स्वर पुनः मुखरित हो जाते हैं - वतन को किया समर्पित / जीवन का हर एक त्यौहार / हम समर्पित कर रहे हैं / ऐसे महामानवों का मुक्ताहार /

काव्य कृति में भारतीय इतिहास, भोगोलिक चित्रांकन, मातृभूमि के प्रति समर्पण भाव,  प्रकृति प्रेम व उपेक्षित के प्रति सहानुभूति आदि के दिग्दर्शन हैं । अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चित्रकार संदीप राशिनकर के रेखांकन ने काव्य कृति को और भी सुंदर बना दिया है । विगत 3 दशकों से अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों में ख्यात नाम राष्ट्रीय ओज कवि की दो पुस्तकें अनंत की ओर (काव्य संग्रह) एवं भोपावर तीर्थ का इतिहास का प्रकाशन भी हो चुका है । इस अवसर पर उन्हें भारतीय आजाद परिषद, अनेक कवियों, लेखकों एवं शिक्षकों के द्वारा बधाइयाँ प्रेषित की गयी।

Post a comment

 
Top