राजगढ़। दादा गुरुदेव श्रीमद्विजय राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. की पाट परम्परा के अष्ठम पट्टधर वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यदेवेश श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. ने अपने धर्मसंदेश में कहा कि मन से अमीर बनो, शक्ति अनुसार जरूरत मंद की मद्द करों, क्योंकि मंदिरों पर भले ही स्वर्ण कलश चढते हो, परंतु सिर को पहले झुकना तो सीढियों पर ही है। परमात्मा की मूर्ति भले ही बड़ी भव्य हो परंतु उसे देखने के बाद भी प्रार्थना तो बंद आंखां से ही होती हैं। व्यक्ति का दर्द चेहरे से नहीं दिखाई देता है क्योंकि वह दर्द दिल में है। मृत्यु की सत्यता को कोई नकार नहीं सकता, परंतु इसकी आहट को सुन भी नहीं सकता है। परमात्मा सच में सभी को चाहता है, परंतु वह किसी को कम और किसी को ज्यादा सुख दुःख बांट नहीं सकता, किसी को सुख के साधन दे देता है तो ज्यादा चिंताओं का बोझ भी लाद देता है और किसी को सुख कम परंतु बेफिक्री भी कम कर देता है।

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