वीराज प्रजापति, सारंगी। होली के 1 सप्ताह बाद सप्तमी तिथि को आने वाला शीतला सप्तमी का पर्व मध्य प्रदेश में ही नहीं पूरे भारत में बड़े उत्साह व श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। शीतला सप्तमी चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी को मनाई जाती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शीतला माता की पूजा करने एवं व्रत रखने से चिकन बॉक्स यानी माता खसरा फोड़े नेत्र रोग नहीं होते हैं। माता इन रोगों से रक्षा करती है, माता शीतला को मां भगवती का रूप माना जाता है शीतला सप्तमी के दिन महिलाएं सुबह ठंडे जल से स्नान करके शीतला माता की पूजा करती है और पूर्व रात्रि को बनाया गया। बासी भोजन (दही, राबड़ी, चावल हलवा, पूरी, गुलगुले) का भोग माता को लगाया जाता है। ठंडा भोजन खाने के पीछे एक धार्मिक मान्यता भी है कि माता शीतला को ठंडा व्यंजन और जल पसंद है। इसलिए माता को ठंडा बासी भोजन का ही भोग लगाया जाता है। परिवार के सभी सदस्य भी ठंडे पानी से स्नान करते हैं और रात में बनाया हुआ बासी भोजन ही करते हैं इससे माता शीतला प्रसन्न होती है।
भेरूलाल प्रजापत पुजारी ने बताया यह ऋतु का अंतिम दिन होता है ऋतु परिवर्तन से मानव शरीर में विभिन्न प्रकार के विकार और रोग होने स्वाभाविक है। इन विकारों को दूर करने एवं इनसे रक्षा करने के लिए माता शीतला का व्रत और पूजन किया जाता है माता शीतला इन विकारों से रक्षा करती है। वही वैज्ञानिक तथ्य यह भी है कि इस दिन के बाद से सर्दी की विदाई मानी जाती है अतः इस दिन अंतिम बार ठंडा भोजन ग्रहण करने के बाद आगे ठंडा बासी भोजन खाना गर्मी में हानिकारक होता है। क्योंकि गर्मी में भोजन खराब हो जाता है, इस तरह धार्मिक और वैज्ञानिक तथ्यों के बीच इस पारंपरिक त्यौहार ने देश में एक विशिष्ट स्थान बना रखा है। जो हमारी समृद्धि संस्कृति महानता को समृद्ध कर रहा है।

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