राजगढ़। राष्ट्रीय ओज कवि यशवंत चैहान की काव्य कृति मुक्ताहार का प्रकाशन देश भारती प्रकाशन नयी दिल्ली के द्वारा किया गया। नूतन वर्ष 2020 की में विश्व की प्रथम कृति के रूप में यह कृति देश-दुनियां को अनुपम देन है। यह कृति अनेक कारणों से वर्तमान में प्रासंगिक और अद्वितीय है। जहां भारत देश की अस्मिता की सौंधी खुशबू इसमें समावित है वहीं महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती एवं असहयोग आंदोलन के 100 वर्ष पूर्ण होने पर इसका प्रकाशन इसे और भी अधिक प्रासंगिक बनाता है। कृति के आवरण एवं विविध खंडों का रेखांकन विश्व प्रसिद्व चित्रकार संदीप राशिनकर के द्वारा किया गया है। इसके पूर्व भी यशवंत चौहान की दो पुस्तकें काव्य संग्रह अनंत की ओर जिसकी भूमिका डाॅ. शिवमंगल सिंह सुमन के द्वारा लिखी गयी थी तथा भोपावर तीर्थ का इतिहास प्रकाशित हो चुकी है।

मुक्ताहार भारतीय जनमानस का प्रतिबिंब है। यह कृति सात खण्डों में लिखी गयी है जो संगीत के सात स्वरों की याद दिलाती है। ये खण्ड है सृजन, प्रकृति, एकता, संस्कृति, मानवता, रूमानियत और देश प्रेम। किन्तु कृति का मूल भाव देश की संस्कृति और देश की गौरव गाथा ही है। सृजन के अंतर्गत उन्होने अपनी सर्जना के लिये ईश्वर के प्रति अनुराग का प्राकटय किया है। इस खण्ड में महाकाव्य परंपरा के मंगलाचरण के दर्शन होते हैं। जहां अपनी काव्य यात्रा के लिये मां शारदा से वरदान मांगा है वहीं उन्होने सर्वधर्म की स्तुति भी की है। उन्होने अपना काव्य धर्म निभाते हुए उन महान साहित्यकारों को भी याद किया है जिन्होनें देश को गौरवान्वित किया है।
एकता का दर्पण है और,
सम्पूर्ण मानवता का सार है ।
कर रहा है दिव्य शक्ति का,
मंगलाचरण मुक्ताहार है ।।

वर्तमान समय में प्रकृति एवं पर्यावरण को बचाना सम्पूर्ण विश्वके लिये एक चुनौति है। प्रकृति के महाविनाश पर चिंता व्यक्त करते हुए मानव प्रजाति को सचेत करते हुए लिखा है कि यदि पर्यावरण को नष्ट होने से नहीं बचाया गया तो आने वाले समय में प्रकृति का तांडव देखने को मिलेगा । वैज्ञानिक प्रगति एवं औद्यौगिकरण के नाम पर हम लगातार प्रकृति से दूर होते जा रहें हैं । इस खण्ड में धरती, आकाश, महासागर, पावन नदियों एवं प्रकृति के विभिन्न रूपों का उल्लेख हुआ है तथा इसमें पंचतत्व का दर्शन भी है ।
धुआँ-धुआँ है आसमाँ,
हवाओं में फैला है जहर।
जागो रे इंसानों जागो,
संकट में हर गाँव, शहर।।

एकता खण्ड में अनेकता में एकता के दर्षन परिलक्षित होते हैं । कवि नें सांप्रदायिक एकता एवं सौहार्द का अनुपम तानाबाना बुना है । इसमें सभी धर्म एवं संस्कृतियों का समन्वय है ।
कुछ कह गये, कुछ सह गये,
फिर गले मिले यह सिलसिला।
सदियों से भारत एक ही है,
यही है भारत का हौंसला ।।

भारत की संस्कृति के विविध रंगों से सराबोर है संस्कृति खण्ड । सिंधु सभ्यता से वर्तमान तक भारतीय संस्कृति का अनुपम चित्रण किया गया है । देवभाषा संस्कृत, वेद, पुराण एवं विभिन्न भाषाओं एवं बोलियों के प्रति सम्मान पुस्तक में देखने का मिलता है। विभिन्न पर्वों एवं उत्सवों के साथ नारी षक्ति एवं भारत षब्द की व्युत्पत्ति का भी सुंदर चित्रण है ।
सिंधु सभ्यता से आज तक,
संस्कृति की अविरल धार ।
वैदिक युग वेदों की रचना,
संस्कृति संगम है मुक्ताहार ।।

मानवता सर्वोपरि है। आम आदमी के प्रति आस्था ही जीवन का आवलंबन है । मानवता खण्ड ऐसे ही मनोभावों के द्वारा संजोया गया है। श्रम शक्ति को ही प्रगति का आधार बताते हुए उसके महत्व का प्रतिपादन किया गया है। गोवर्धन, हलधर और गौमाता की स्तुति की गयी है। भूखे, गरीब, और अनाथ लोगों का दर्द दिखाई देता है ।
देश यह मजदूर का है,
और देश यह किसान का।
देश मेरा आईना सदा ही,
मेहनतकश इन्सान का।।

भौतिकता के इस दौर में सृजन शक्ति और उसकी प्रेरणा का दर्शन है रूमानियत खण्ड। इसमें अपनी सर्जना के लिये प्रेम और अनुराग का सुन्दर चित्रण किया है।
तुम उर्वषी तुम मेनका,
प्रतिबिम्ब हो तुम ताज का।
प्रेम का प्रतिमान हो तुम,
अंदाज हो मुमताज का।।

बडे ही सहज ढंग से काव्य यात्रा प्रेम से देशप्रेम की ओर बढ़ी है। राष्ट्र निर्माण में अनेक युगपुरूषों एवं राष्ट्र निर्माताओं ने अपने प्राणों का उत्सर्ग किया है। इस खण्ड में उनका उल्लेख किया गया है। जाति, धर्म, संप्रदाय से उपर उठकर देश को सर्वोपरि मानत हुए अमर तिरंगे के यश और वैभव का गुणगान किया गया है। भारत को सर्वोपरि मानते हुए लिखा है -
भारत गांधी की कल्पना,
भारत सरदार पटेल की कामना।
भारत सुभाष का कर्म है,
भारत संस्कृति की प्रस्तावना।।
इस काव्य क्रृति की सबसे बड़ी  विषेषता यह है कि इसमें भारत की संस्कृति के सभी पहलुओं को स्पर्श किया गया है। देश में राष्ट्र भक्ति की अलख जगाने वाले राष्ट्रीय ओज कवि यशवंत चैहान की यह कृति पठनीय और संग्रहणीय भी है। कृति में कुल 110 पृष्ठ हैं तथा मूल्य 300 रूपये है। कृति अमेजन पर भी उपलब्ध है।

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