पेटलावद। दो दिन पूर्व बामनिया के एक व्यापारी से बामनिया स्थित बडोदा बैंक के कर्मचारी की और से विवाद होने के पश्चात पेटलावद पुलिस थाने में व्यापारी के विरूद्ध आपराधिक मुकदमा दर्ज करवायें जाने का मामला प्रकाश में आया था। बैंक और व्यापारी के परिजनों द्वारा अलग अलग प्रकार से जनता के सामने अपने पक्ष रखे जा रहे है और बैंक के द्वारा तो विवाद के समय का वीडियो भी शोसल मीडिया पर जारी कियें गयें है। एक दुसरे के उपर दोष रोपण करते हुए सामने वाले पक्ष की गलती के कारण विवाद की यें परिस्थियां निर्मित होना बताया जा रहा है। लेकिन वास्तविकता क्यां है, यह तथ्य अब तक जनता के बिच स्पष्ट रूप से खुलकर सामने नहीं आ पाया है, लेकिन व्यापारी के साथ जो घटना घटी उन परिस्थियों से आज प्रत्येक बैंक के हर खातेधारक को सामना करना पड़ रहा है।

हर शख्स जुडा है बैंक से -
अमुमन आज गरीब से गरीब आदमी का बैंक से लेन देन होकर बैंक के बिना आदमी का सामान्य काम काज बैंक से प्रतिदिन पडता है। एक गरीब आदमी जो अपने मेहनत की कमाई से खर्च के बाद बची हुई पुंजि को बैंक में जमा करवाता है, या कोई सरकारी कर्मचारी जिसकी तन्खाह बैंक के माध्यम से निकलती है, या व्यापारी वर्ग जिन्हें अपने रोज मर्रा के व्यापार के लिए आरटीजीएस की प्रक्रिया के लिए बैंक में आना जाना पडता है, या किसानों को कृषी ऋण लेने या चुकाने, अथवा विघार्थि वर्ग को चालान आदि जमा करने या पेंशेनरों को पेंशन लेने के लिए बैंक में जाना हीं पडता है। इस तरह से वर्तमान आधुनिक युग में प्रत्येक आम से लेकर खास व्यक्ति बैंक से जुड़ गया है, और प्र्रत्येक व्यक्ति के काम काज बैंको पर निर्भर हो गयें है।
स्टाफ की कमी और तकनिकी रूकावटे -
इस तरह से जबकि हर व्यक्ति बैंक पर निर्भर है और बैंक के प्रतिदिन के कामकाज के समय बैंको में सामान्य रूप से भीड़ देखने को मिलती है। बैंको में पहले से हीं स्टाफ की कमी है और जो स्टाफ बैंको को उपलब्ध है, उनकी भी बैंक के अंदर अलग-अलग आंतरिक जिम्मेदारियां है, चुकी मामला रूपयों की लेन देन का होता है, इसलिए काउंटर पर बैठे बैंक कर्मचारी को अति गंभीरता के साथ अपनी ड्युटी को अंजाम देना होता है। साथ हीं बैंक कर्मचारी को लेन देन का सारा हिसाब उसी समय खातेदार के सामने कम्प्युटर सिस्टम में अपलोड करना पडता है, यह कम्प्युटर सिस्टम कई बार अत्यधिक काम काज के दबाव के चलते या तो धिमा पड़ जाता है या लिंक फेल हो जाती है। इन परिस्थियों में बैंक कर्मचारी जो कि सिस्टम के आगे मजबुर है, अपने काम काज को आगे नहीं बड़ा पाता और बैंक में आने वाले व्यक्ति के काम मेें देरी उत्पन्न होती है, और कहीं न कहीं यह देरी भी विवादों को जन्म देती है। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार को बैंको में स्टाफ के साथ हीं साथ पर्याप्त संसाधन उपलब्ध करवाना चाहिए जिससे प्रतिदिन बैंको में बडने वाले खातेधारकों का काम सुचारू व आसान तरिके से निपट सकें। 

कर्मचारियों का आचरण भी देता है, विवाद को न्योता -
पेटलावद एवं आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों सहित समस्त राष्ट्रीकृत बैंको में कामकाज के दिनों में अक्सर काम का दबाव देखा जाता है, वहीं बैंक कर्मचारियों का बैंक के बडे खातेधारकों के प्रति सद्भाविक व दोस्ताना रवेया देखने को मिलता है और एक गरीब आदमी को हमेशा बैंक कर्मचारियों की झिड़की व अनदेखी का सामना करने का मजबुर होना पडता है। बैंक कर्मचारियों की बडे खातेधारको के प्रति सद्भावना इसी से दिखाई देती है कि कई खातेधारक बैंक कर्मचारियों के पास सिधे उनकी कुर्सी एवं केश काउंटर तक पहुंचने का मादा रखकर लाईन से हटकर काम करवाने में भी सफल हो जाते है और जब बडे खातेधारक को कर्मचारियों से इस वीआईपी ट्रिटमेंट या व्यवहार की आदद पड़ जाती है और किसी दिन कोई कर्मचारी बडे खातेधारक को नियमों का हवाला देता है तब ऐसी विरोध और विवाद की परिस्थियां निर्मित होती है, जो थानें तक पहुंच जाती है। वहीं बैंक कर्मचारियों के द्वारा पिछले कुछ सालों से मध्यस्थों व दलालों के माध्यम से काम करने की जो आदद है उसमें भी सुधार की जरूरत है।

सभी खातेदार बैंक के लिए हो समान -
होना तो यह चाहिए की बैंक कर्मचारी नियम अनुसार छोटे व बडे खातेधारको के साथ समानता का व्यवहार करें और उनकी समस्याओं को सुने व समझे न की उनके साथ र्दुव्यहार करें। वहीं भारतीय परंपरा अनुसार वरिष्ट नागरिको और महिलाओं के प्रति जो सद्भाव अन्य सरकारी कार्यालयों में दिखायें जाने का निर्देश है, उनका भी पालन यदी बैंको में किया जाए तो हो सकता है कि इस प्रकार की विवाद की स्थितिया निर्मित न हो। 

भला है कि कियोस्क सेंटर खुले है - 
जेसे-जैसे आम जनता की निर्भरता बैंक पर बडती जा रहीं है, बैंको के उपर कामकाज का भी दबाव बड़ता जा रहा है। पिछले सालों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के डिजिटल इंडिया सिस्टम के साथ कई खातेधारक डिजिटल प्रक्रिया का इस्तमाल करते है। वहीं छोटे स्तर के खातेधारक बैंको के कियोस्क सेंटरों से अपना काम निपटा रहे है। यदि डिजिटल पेमेंट और कियोस्क सेंटर नहीं होते तो बैंको में क्या स्थिति निर्मित होती यह बामनिया की घटना से अच्छी तरह समझा जा सकता है। 

खातेधारको की भी जिम्मेदारी - 
अमुमन बडे खातेधारको का लेन देन बैंक से प्रतिदिन होता है और बडे स्तर पर होता है, यह बात भी मानी जा सकती है कि बडे खातेधारकों से बैंक को व्यापारिका फायदा भी होता है, लेकिन व्यापार व्यवसाय के चक्कर में सामान्य व्यवहार की प्रक्रिया को नहीं भुलाया जा सकता, चाहे हजार रूपयें जमा करने वाला गरीब आदमी हो या एक लाख जमा करने वाला बड़ा खातेधारक। बैंक को या तो दोनो के लिए लिमिट वाले अलग-अलग काउंटर कर देने चाहिए जिससे की दोनो की समय की बचत हो। वहीं बडे खातेधारक को भी अपने सामांतर खडे सामान्य छोटे खातेधारक के समय के मुल्य को तवज्जों देते हुए बैंक के नियम अनुसार काम करने में बैंक कर्मचारियों का सहयोग करना चाहिए न की बैंक से अपने लिए वीआईपी व्यवस्था की उम्मीद रखना चाहिए। 

अपमानित न हो खातेदार -
इस तरह से विवादों की परिस्थिती उत्पन्न न हो इसलिए बैंक और खादेधारक दोनो को बिठाना चाहिए आपसी तालमेल अन्यथा आज के समय में अपने हीं जमा कियें हुए रूपयें लेने के लिए जाने वाले खातेधारक को बैंक में कियें जा रहे र्दुव्यवहार के चलते खुद को अपमानित महसुस करना पड़ता है। यदी दोनो पक्ष थोड़ा सुधार कर ले तो विवाद पेदा हीं न हो।

Post a comment

 
Top