कुर्सी का खेल बड़ा ही अजीबोगरीब है ये आपसे कुछ भी करवा सकता है। कुर्सी के लालच में न जाने कितने ही लोग एक दूसरे के दुश्मन बने बैठे हैं। यहां बात हम पीएम मोदी और ममता बनर्जी की कर रहे हैं। जी हां, जैसा कि आप सभी इस बात से परिचित हैं कि अभी लोकसभा चुनाव चल रहे हैं और ऐसे में राजनीतिक दल एक दूसरे पर छींटाकसी करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। चुनाव जीतने के लिए मार्केट में आजकल दो ट्रेंड बहुत ही चलन में हैं। पहला अपना-अपना संकल्प पत्र बनाकर जनता को ठगो, दूसरा एक दूसरे का झूठा प्रचार करो।
क्या संकल्प पत्र बना देने भर से चुनाव जीतना आसान है? क्या रोड शो और जनसभाएं कर देने भर से जनता की भावनाओं को जीतना आसान है? बिल्कुल नहीं,  जनता इतनी भी नासमझ नहीं है। 70 साल और 5 साल के कार्यों का अंतर वह भी जानती है। मीडिया कितना भी एक पक्ष का समर्थन करके प्रचार करे लेकिन जमीनी तौर पर जो कार्य हुए हैं जनता उन्हें बखूबी जानती है।
झूठे प्रचार की बात करें तो इस रेस में राहुल गांधी बहुत ही आगे हैं और वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश की भी बार बार अवहेलना करते रहते हैं। बता दें कि कुछ दिन पहले चौकीदार चोर है के नारे लगाने पर सुप्रीम कोर्ट में उन्हें माफी मांगनी पड़ी, लेकिन अगले ही दिन वह फिर से चौकीदार चोर है के नारे लगाने लगे। लेकिन बात यहां यह उठती है कि कौन चोर है और कौन असल चौकीदार है इसका निर्णय तो न्यायपालिका ही करेगी। राजनीतिक दलों को अपने उपर ध्यान देते हुए खुद की योजनाओं को खुद के विकास की बात को जनता के सामने लाना चाहिए न कि दूसरी पार्टियों के लिए गलत शब्दों का प्रयोग करना चाहिए।
वहीं दूसरी ओर पं. बंगाल सीएम और तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी की बात करें तो कुछ ही दिन पहले जब ओडिशा में फानी तूफान आया था तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वहां क्षतिग्रस्त इलाकों का जायजा लेने पहुंचे और इस समस्या से निपटने के लिए ममता बनर्जी से बात करनी चाही, लेकिन पीएम मोदी के दो बार फोन करने के बावजूद भी उन्होंने फोन नहीं उठाया और पीएम मोदी के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया। अब बात ये उठती है कि क्या आप किसी प्रमुख पद की गरिमा का अपमान कर सकते हैं शायद नहीं। इसीलिए जरूरत इस बात की है कि राजनीतिक दलों को एक दूसरे के प्रति गरिमापूर्ण व्यवहार को अपनाना चाहिए। और इस कुर्सी के खेल में एक दूसरे का नहीं तो कम से कम कुर्सी का तो सम्मान करना चाहिए।
वहीं अब बात करें मध्यप्रदेश के सियासी समीकरणों की तो मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा ट्रेंड में जो उम्मीदवार हैं जिनके लिए आजकल सोशल मीडिया पर ओपीनियन पोल तक चल रहे हैं वह साध्वी प्रज्ञा और दिग्विजय सिंह हैं। जी हां, भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा को और कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह को चुनावी मैदान में उतारा है। इसीलिए हम ये कह सकते हैं कि एक तरफ भाजपा के पास इमोशनल कार्ड है तो दूसरी तरफ कांग्रेस के पास राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं। लेकिन दोनों ही उम्मीदवारों की यह लड़ाई राजनीतिक नहीं है यह व्यक्तिगत हो चुकी है। जरूरत इस चीज की है कि कुर्सी के खेल में अपने आप को महारथी साबित करने के चक्कर में आप जनता के सामने अभद्र टिप्पणियां करना बंद करें। अगर लोकतंत्र जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए है तो यहां बात भी जनता की ही होनी चाहिए। मुद्दे भटकाने वाली राजनीति नहीं होना चाहिए। इसीलिए जब जनता कुर्सी पर बैठने वाले व्यक्ति को चुनती है तो उस व्यक्ति का दायित्व है कि वह जनता के बारे में सोचे विकास के लिए काम करे न कि इमोशनल कार्ड खेलकर जनता की भावनाओं के साथ खेले। इसीलिए जरूरत इस बात की है कि कुर्सी का खेल कुर्सी तक सीमित रहे। विकास की बातें सिर्फ संकल्प पत्रों में न हो उन्हें जमीनी तौर पर कैसे रूप प्रदान किया जाए इसकी भी बात हो और असल मायने में राजनीति वही है जब आप लोकतंत्र की बात करें, जनतंत्र की बात करें, न कि उसमें व्यक्तिगत रूप से सम्मिलत हो।
उक्त लेख की लेखिका ज्योति मिश्रा फ्रीलांस जर्नलिस्ट, ग्वालियर (म.प्र.) है। 

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