नरेन्द्र पंवार, दसई। निमाड, मालवा एवं राजस्थान क्षेत्र मे प्रमुख रूप से मनाया जाने वाला गणगोर पर्व नगर सहित आसपास के समस्त गांवो मे मनाया गया। मां गौरा की पूजा के लिये मनाया जाने वाले इस पर्व पर कुंवारी कन्यायें अपने इच्छित वर पाने के लिये तथा सुहागिने अपने सौभाग्य के लिये पूरे 16 दिन मां पार्वती तथा शिव को इशर के रूप मे पूजती है। वहीं षिव को धणियार राजा तथा मां पार्वती को रणुबाई के रूप मे भी कुछ गांवों मे पूजने का रिवाज है। चै़त्र माह की कृश्ण पक्ष की तृतीया से आरंभ होकर यह त्योंहार नव रात्रि मे शुक्ल पक्ष की तृतीया तक मनाया जाता हैं। यह मां कुुश्मांडा का दिन होता है। जो सुख समृघ्दि का प्रतिक माना जाता है। कुमारपाट, नयाबाजार ,तेजाजी चोक, नीम चोक,संजय कालोनी, जूना बाजार, हरदेवलाला चैक सहित अनेक स्थानो पर माता का रथ निकालने की प्रथा है।
कुमारपाट स्थित मां गणगोर की पूजा करने वाली गिरजा चौहान ने बताया कि वैसे तो सभी महिलाये गणगोर माता की पूजा करती है। लेकिन विषेश रूप से वे महिलायें जो माता से मन्नते करती है और जिनकी मन्नत पूरी होजाती है वे विषेश रूप से माता को विसर्जन करने के एक दिन पूर्व अपने घर पर लेजाती है। जहां पर रात भर गणगोर माता कि भजन पूजन के साथ आव भगत करती है। कुमारपाट की गणगोर माता का विसर्जन विद्युत मंडल स्थित कालिका माता मंदिर पर शुक्रवार को किया गया। इस अवसर पर महिलाओं ने एक दूसरे पर केसरिया रंग के छींटे  डालकर मंगल कामना की। वहीं हास्य परिहास के रूप मे महिलाओं ने अपने पति के साथ अपना नाम लेते हुवे गणगोर माता को पानी भी पिलाया।
पाटीदार समाज के द्वारा स्थानीय चार भुजा मंदिर से गणगोर माता का रथ निकाला गया। जिसे ईशर के रूप मे सुन्दर वस़्त्रों मे सजाकर बाने के रूप मे गंगाजलिया धाम तक ले जाया गया। समस्त कन्यायें एवं सुहागिनों ने सुंदर वस़्त्र धारण कर रास्ते भर नृत्य करते हूवे रथ निकाला। सभी ने शिव पार्वती के रूप मे ईशर की पुजा कर अपने इच्छित वर घर के साथ सौभाग्य की कामना की। इस अवसर पर माता के जवारे ले जाकर सुख समृघ्दि के लिये अपने-अपने घरो के भंडारो मे रखें। जहां पर जवारे बोये जाते है उसे मायका तथा जहां विसर्जन होता है उसे ससुराल कहा जाता है।

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